learn hindi music -- introduction
हम सब में एक बात समान है। हम सभी हिंदी फ़िल्मी गाने पसंद करते हैं। पसंदीदा गायक या गायिका भिन्न हो सकते हैं लेकिन मुझे अभी तक एक भी ऐसा व्यक्ति नही मिला जिसे गाने पसंद ना हों। हम सभी में एक bathroom singer छुपा होता हैं। हम गाने गुनगुनाते हुए किसी और ही दुनिया में चले जाते हैं।
लेकिन बात यहीं खत्म नहीं होती। हम सभी में गाना सीखने की थोड़ी बहुत ललक भी होती है। लेकिन अधिकतर लोग ये कहते हैं की "अरे बचपन में सीख नहीं पाए, अब उम्र नहीं है सीखने की"। कुछ लोग इसलिए सीखने की हिम्मत नहीं करते क्योंकि उन्हें लगता है की संगीत सीखना उनके बस की बात नहीं। कुछ लोग समय ना होना का कारण भी बताते हैं। कुछ लोग संगीत सीखने music class में जाते हैं और कुछ हफ्ते या महीने के बाद छोड़ देते हैं.
मैं आपको एक बात बताता हूँ। कोई भी किसी भी उम्र में संगीत सीख सकता है और ये इतना मुश्किल नहीं जितना समझा जाता है। हाँ आपको कितना सीखना है ये आप पर निर्भर करता है। लेकिन संगीत सीखना दुखदायी या मुश्किल नहीं बल्कि अगर सही तरीके से सीखा जाए तो बड़ा मनोरंजक है। हाँ थोड़ा प्रयास करना पड़ता है।
music classes में जाने वालों से अक्सर ये सुनाने में आता है की जो सीख रहे हैं उसका हम जो गाने सुनते हैं उससे कोई सम्बन्ध ही नहीं है। फिर कुछ दिनों के बाद संगीत सीखना पढाई जैसा हो जाता है और हम सभी बचपन से ये जानते हैं की जहाँ पढाई आती है यहाँ बोरियत भी साथ आती है।
मैं आपको music class न जाने की या जा रहें हो तो छोड़ने की सलाह नहीं दे रहा। मेरा प्रयत्न है की संगीत सीखना और आपके पसंदीदा गाने इसके बीच की कड़ी से आपको अवगत कराना। यहाँ दिया गया संगीत का ज्ञान आपको कम से कम आपको एक अच्छा श्रोता तो बना ही सकता है जिससे आप संगीत सुनने के साथ समझ भी सकें। आपकी रूचि और परिपक्व हो। साथ ही आपको आपके अंदर छुपे गुणों का भी ज्ञान हो। जैसे की आपकी सुरों में रूचि है या ताल में। आपमें गायक बनाने के गुण हैं या वादक बनाने के। आपको जब इन बातों का बोध होगा तो आप सही दिशा में संगीत सीखना जारी रख सकते हैं। उसके बाद आप और रियाज़ करेंगे तो आप अपने आप को अपने आसपास की फ़िल्मी संगीत की महफ़िल में stage पर पाएंगे। मेरा उद्देश्य है आपको संगीत का प्राथमिक ज्ञान देना, आपको एक गंभीर श्रोता बनाना, आपकी रूचि को और परिपक्व बनाना, और आपको फ़िल्मी संगीत, ग़ज़ल, भजन आदि के लिए गायन या वादन सिखाना। आगे आपकी रूचि और समर्पण और बढ़ा तो फिर आप किसी गुरु के पास जाकर ठीक से शास्त्रीय संगीत में महारथ हासिल कर सकते हैं।
इस दौरान हम फ़िल्मी गीतों का साथ कभी नहीं छोड़ेंगे। जिससे आपकी रूचि बनी रहे और संगीत सीखना पढाई न बनकर एक व्यायाम बन जाए।
संगीत सीखना विज्ञान या गणित सीखने से अलग होता है। काफी लोग संगीत को विज्ञान की तरह सीखने की गलती करते है जिससे कारण उन्हें परिणाम नहीं मिलते।
संगीत सीखने के तीन भाग हो सकते हैं। संगीत की भाषा की समझ, कानों को तैयार करना और संगीत निर्माण करना। तीनो भाग महत्त्वपूर्ण होते हैं और तीनो का ज्ञान धीरे धीरे एक साथ बढ़ना चाहिए। प्रारम्भ में अगर किसी एक ही भाग पर लम्बे समय तक ध्यान दिया जाए तो उससे परिणाम नहीं आते। उदाहरण संगीत का व्याकरण किसी भी संगीत की पुस्तक से पढ़ कर समझा जा सकता है लेकिन उसका कोई लाभ नहीं अगर हमारे कान उस ज्ञान को किसी गाने में पहचान न सकें, या फिर हम उसे गा या बजा न सकें.
पहला भाग जो संगीत की भाषा से संबंधित है, आपको संगीत का अक्षर ज्ञान कराएगा. अक्षर से शब्द बनते हैं और शब्द से वाक्य और वाक्य से भाव प्रकट किये जाते हैं। एक अक्षर का ज्ञान होते ही आप कोई भी गाना सुनते हुये उसमें अपने परिचय के अक्षर ढूंढ़ने लगेंगे। जिससे आपका कान और तैयार होगा।
दूसरा भाग कानों को तैयार करना है। अच्छा संगीत व्याकरण के बोध के साथ सुनने पर तुरंत कान तैयार होने लगते हैं। एक ही राग/ताल के गानों में समानता दिखने लगती है। कान को सुरीले और बेसुरे के परख होने लगती है। अगर आपके कान तैयार होंगे तो आपको गायन या वादन करते समय स्वयं की गलतियों का बोध होने लगेगा और आपका गायन और वादन निखरता जायेगा.
तीसरा भाग है संगीत का निर्माण। ये है संगीत के अक्षर, शब्द, वाक्य और अंत में भाव प्रकट करने की क्षमता। यहाँ सब कुछ रियाज़ पर निर्भर करता है। जैसा की पहले बताया आपको रियाज़ करने के लिए पहले या दूसरे भाग में पारंगत होने की आवश्यकता नहीं है। व्याकरण का १ पाठ समझिये उसे सुनिए और उसके गायन या वादन का अभ्यास कीजिये। धीरे धीरे आपको आपकी रूचि, क्षमता और गुणों का बोध होने लगेगा।
ताल का ज्ञान किसी भी संगीत में आवश्यक है इसलिए अगर आप गायक या सुरवाद्य के वादक भी बनाना चाहते हैं तो भी ताल का ज्ञान आवश्यक है। संगीत के इस अथाह सागर में पहली डुबकी हम ताल के किनारे पर लेंगे।
लेकिन बात यहीं खत्म नहीं होती। हम सभी में गाना सीखने की थोड़ी बहुत ललक भी होती है। लेकिन अधिकतर लोग ये कहते हैं की "अरे बचपन में सीख नहीं पाए, अब उम्र नहीं है सीखने की"। कुछ लोग इसलिए सीखने की हिम्मत नहीं करते क्योंकि उन्हें लगता है की संगीत सीखना उनके बस की बात नहीं। कुछ लोग समय ना होना का कारण भी बताते हैं। कुछ लोग संगीत सीखने music class में जाते हैं और कुछ हफ्ते या महीने के बाद छोड़ देते हैं.
मैं आपको एक बात बताता हूँ। कोई भी किसी भी उम्र में संगीत सीख सकता है और ये इतना मुश्किल नहीं जितना समझा जाता है। हाँ आपको कितना सीखना है ये आप पर निर्भर करता है। लेकिन संगीत सीखना दुखदायी या मुश्किल नहीं बल्कि अगर सही तरीके से सीखा जाए तो बड़ा मनोरंजक है। हाँ थोड़ा प्रयास करना पड़ता है।
music classes में जाने वालों से अक्सर ये सुनाने में आता है की जो सीख रहे हैं उसका हम जो गाने सुनते हैं उससे कोई सम्बन्ध ही नहीं है। फिर कुछ दिनों के बाद संगीत सीखना पढाई जैसा हो जाता है और हम सभी बचपन से ये जानते हैं की जहाँ पढाई आती है यहाँ बोरियत भी साथ आती है।
मैं आपको music class न जाने की या जा रहें हो तो छोड़ने की सलाह नहीं दे रहा। मेरा प्रयत्न है की संगीत सीखना और आपके पसंदीदा गाने इसके बीच की कड़ी से आपको अवगत कराना। यहाँ दिया गया संगीत का ज्ञान आपको कम से कम आपको एक अच्छा श्रोता तो बना ही सकता है जिससे आप संगीत सुनने के साथ समझ भी सकें। आपकी रूचि और परिपक्व हो। साथ ही आपको आपके अंदर छुपे गुणों का भी ज्ञान हो। जैसे की आपकी सुरों में रूचि है या ताल में। आपमें गायक बनाने के गुण हैं या वादक बनाने के। आपको जब इन बातों का बोध होगा तो आप सही दिशा में संगीत सीखना जारी रख सकते हैं। उसके बाद आप और रियाज़ करेंगे तो आप अपने आप को अपने आसपास की फ़िल्मी संगीत की महफ़िल में stage पर पाएंगे। मेरा उद्देश्य है आपको संगीत का प्राथमिक ज्ञान देना, आपको एक गंभीर श्रोता बनाना, आपकी रूचि को और परिपक्व बनाना, और आपको फ़िल्मी संगीत, ग़ज़ल, भजन आदि के लिए गायन या वादन सिखाना। आगे आपकी रूचि और समर्पण और बढ़ा तो फिर आप किसी गुरु के पास जाकर ठीक से शास्त्रीय संगीत में महारथ हासिल कर सकते हैं।
इस दौरान हम फ़िल्मी गीतों का साथ कभी नहीं छोड़ेंगे। जिससे आपकी रूचि बनी रहे और संगीत सीखना पढाई न बनकर एक व्यायाम बन जाए।
संगीत सीखना विज्ञान या गणित सीखने से अलग होता है। काफी लोग संगीत को विज्ञान की तरह सीखने की गलती करते है जिससे कारण उन्हें परिणाम नहीं मिलते।
संगीत सीखने के तीन भाग हो सकते हैं। संगीत की भाषा की समझ, कानों को तैयार करना और संगीत निर्माण करना। तीनो भाग महत्त्वपूर्ण होते हैं और तीनो का ज्ञान धीरे धीरे एक साथ बढ़ना चाहिए। प्रारम्भ में अगर किसी एक ही भाग पर लम्बे समय तक ध्यान दिया जाए तो उससे परिणाम नहीं आते। उदाहरण संगीत का व्याकरण किसी भी संगीत की पुस्तक से पढ़ कर समझा जा सकता है लेकिन उसका कोई लाभ नहीं अगर हमारे कान उस ज्ञान को किसी गाने में पहचान न सकें, या फिर हम उसे गा या बजा न सकें.
पहला भाग जो संगीत की भाषा से संबंधित है, आपको संगीत का अक्षर ज्ञान कराएगा. अक्षर से शब्द बनते हैं और शब्द से वाक्य और वाक्य से भाव प्रकट किये जाते हैं। एक अक्षर का ज्ञान होते ही आप कोई भी गाना सुनते हुये उसमें अपने परिचय के अक्षर ढूंढ़ने लगेंगे। जिससे आपका कान और तैयार होगा।
दूसरा भाग कानों को तैयार करना है। अच्छा संगीत व्याकरण के बोध के साथ सुनने पर तुरंत कान तैयार होने लगते हैं। एक ही राग/ताल के गानों में समानता दिखने लगती है। कान को सुरीले और बेसुरे के परख होने लगती है। अगर आपके कान तैयार होंगे तो आपको गायन या वादन करते समय स्वयं की गलतियों का बोध होने लगेगा और आपका गायन और वादन निखरता जायेगा.
तीसरा भाग है संगीत का निर्माण। ये है संगीत के अक्षर, शब्द, वाक्य और अंत में भाव प्रकट करने की क्षमता। यहाँ सब कुछ रियाज़ पर निर्भर करता है। जैसा की पहले बताया आपको रियाज़ करने के लिए पहले या दूसरे भाग में पारंगत होने की आवश्यकता नहीं है। व्याकरण का १ पाठ समझिये उसे सुनिए और उसके गायन या वादन का अभ्यास कीजिये। धीरे धीरे आपको आपकी रूचि, क्षमता और गुणों का बोध होने लगेगा।
ताल का ज्ञान किसी भी संगीत में आवश्यक है इसलिए अगर आप गायक या सुरवाद्य के वादक भी बनाना चाहते हैं तो भी ताल का ज्ञान आवश्यक है। संगीत के इस अथाह सागर में पहली डुबकी हम ताल के किनारे पर लेंगे।
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