Parts of a song-- Hindi
गाना कैसे बनता है? आप कहेंगे उसमे ऐसी कौनसी बड़ी बात है। गीतकार ने गीत लिखे, संगीतकार ने धुन बनाई, गायक गायिका ने गा दिया। सही है, होता ऐसा ही है लेकिन इन सबके अलावा भी काफी चीज़ें होती हैं जिन्हे जानना जरुरी है। हम गाने बनने की प्रक्रिया को न देखते हुए ये देखेंगे की किसी गाने को सुनते समय उसमे क्या क्या बातें देखी जा सकती हैं। अपने कानों को तैयार करने के लिए गाना सुनते समय इन बातों का ध्यान रखा जाए तो कोई भी गाना आपके लिए संगीत का एक छोटा सा पाठ हो जायेगा।
किसी गाने को सुनते समय उसके गीतकार, संगीतकार और गायक तो आपको मालूम होते ही हैं साथ में आप गाने के शब्दों पर भी ध्यान देते ही हैं. किसी भी गीत में २ अन्य चीज़ें अवश्य ही होती हैं और वो
हैं.
१. गीत का ताल
२. गीत की श्रुति (सा/scale )
दुनिया के किसी भी प्रकार का संगीत चाहे वो western, pop, rock, jazz, arabian हो या लोक संगीत, ग़ज़ल, भजन, शास्त्रीय संगीत या वादन उसमे ये दोनों चीज़ें अवश्य होती हैं.
ग़ज़ल, भजन, शास्त्रीय संगीत या पुराने फ़िल्मी गीत इनमे एक तीसरी चीज़ भी होती हैं जिसे राग कहते हैं. एक और चीज़े जिसे chords कहते हैं western music और कई फ़िल्मी गानों में देखी जाती है। इसके अलावा गाना सुनते हुए उसमे कौन कौन से वाद्य बजाये गए हैं उस पर ध्यान देना भी बड़ा रोचक होता है। O P नैयर के गानों में आपको सारंगी सुनने को मिलेगी, S D बर्मन बांसुरी का इस्तेमाल बड़ी खूबसूरती से करते थे तो शंकर जयकिशन के गानों में accordion का महत्व रहता है। साथ में बजने वाले वाद्यों से गाने में रंग भरा जाता है इसलिए वाद्यों की तरफ ध्यान जाना चाहिए।
अभी तक बताये गई चीज़ों में से श्रुति, राग और chords को हम बाद में देखेंगे। सबसे पहले आपको आदत डालनी होगी गाने के ताल को पहचानने की। ताल को पहचानना राग या श्रुति को पहचानने से काफी आसान है। हम उसकी आगे बात करेंगे लेकिन उसके पहले गाने को अलग हिस्सों में तोडा जाए.
जो धुन गाना शुरू होने के पहले बजाई जाती है उसे prelude कहा जाता है। उसके बाद गाने का मुखड़ा आता है। मुखड़े और अंतरे के बीच या फिर अंतरों के बीच जो धुन बजाई जाती है उसे interlude कहा जाता है।
तो कुल मिला कर गाने में ये क्रम होता है।
prelude ( वाद्य)
मुखड़ा (गायक/गायिका)
interlude (वाद्य)
अंतरा (गायक/गायिका)
interlude
अंतरा (गायक/गायिका)
Prelude और interlude का गानों में बड़ा महत्व होता है। कईं गानों के interlude और prelude उनकी पहचान बन जाते हैं।
इसके अलावा किसी किसी गानों में Ad-lib भी होता है। Ad-lib गाने का वो हिस्सा होता है जो ताल में बंधा नहीं होता जैसे "शोर नहीं बाबा सोर" ।
चलिए अब ताल के बारे में बात करते हैं।
कोई भी गाना किसी न किसी ताल में लयबद्ध किया जाता है। शास्त्रीय संगीत में वैसे कईं ताल हैं लेकिन अगर हम फ़िल्मी गानों, भजन या ग़ज़ल की बात करें तो इसमें मुख्यतः ३ या ४ ताल उपयोग में लाए गए हैं। पर इससे भी पहले का सवाल, ताल क्या है?
ताल गीत को लयबद्ध करने का एक माध्यम होता है। ताल में मात्रायें होती हैं। हम अलग अलग ताल और ठेके आगे देखेंगे लेकिन सरल शब्दों में कहा जाए तो कोई भी गाना निश्चित मात्राओं में लयबद्ध किया जाता है। उदाहरण "जब प्यार किया तो डरना क्या " 6 मात्राओं में लयबद्ध किया गया है और इन ६ मात्राओं के ताल को दादरा कहा जाता है और हम यह कह सकते हैं की ये गीत ताल दादरा में है। आम तौर पर एक गाने में मात्राओं की संख्या निश्चित रहती है बदलती नहीं।
95% हिंदी फ़िल्मी गाने या तो 8 मात्राओं में लयबद्ध होते हैं, या फिर ६ मात्राओं में। 8 मात्रा के ताल को कहरवा कहते हैं।
किसी गाने को सुनते समय उसके गीतकार, संगीतकार और गायक तो आपको मालूम होते ही हैं साथ में आप गाने के शब्दों पर भी ध्यान देते ही हैं. किसी भी गीत में २ अन्य चीज़ें अवश्य ही होती हैं और वो
हैं.
१. गीत का ताल
२. गीत की श्रुति (सा/scale )
दुनिया के किसी भी प्रकार का संगीत चाहे वो western, pop, rock, jazz, arabian हो या लोक संगीत, ग़ज़ल, भजन, शास्त्रीय संगीत या वादन उसमे ये दोनों चीज़ें अवश्य होती हैं.
ग़ज़ल, भजन, शास्त्रीय संगीत या पुराने फ़िल्मी गीत इनमे एक तीसरी चीज़ भी होती हैं जिसे राग कहते हैं. एक और चीज़े जिसे chords कहते हैं western music और कई फ़िल्मी गानों में देखी जाती है। इसके अलावा गाना सुनते हुए उसमे कौन कौन से वाद्य बजाये गए हैं उस पर ध्यान देना भी बड़ा रोचक होता है। O P नैयर के गानों में आपको सारंगी सुनने को मिलेगी, S D बर्मन बांसुरी का इस्तेमाल बड़ी खूबसूरती से करते थे तो शंकर जयकिशन के गानों में accordion का महत्व रहता है। साथ में बजने वाले वाद्यों से गाने में रंग भरा जाता है इसलिए वाद्यों की तरफ ध्यान जाना चाहिए।
अभी तक बताये गई चीज़ों में से श्रुति, राग और chords को हम बाद में देखेंगे। सबसे पहले आपको आदत डालनी होगी गाने के ताल को पहचानने की। ताल को पहचानना राग या श्रुति को पहचानने से काफी आसान है। हम उसकी आगे बात करेंगे लेकिन उसके पहले गाने को अलग हिस्सों में तोडा जाए.
जो धुन गाना शुरू होने के पहले बजाई जाती है उसे prelude कहा जाता है। उसके बाद गाने का मुखड़ा आता है। मुखड़े और अंतरे के बीच या फिर अंतरों के बीच जो धुन बजाई जाती है उसे interlude कहा जाता है।
तो कुल मिला कर गाने में ये क्रम होता है।
prelude ( वाद्य)
मुखड़ा (गायक/गायिका)
interlude (वाद्य)
अंतरा (गायक/गायिका)
interlude
अंतरा (गायक/गायिका)
Prelude और interlude का गानों में बड़ा महत्व होता है। कईं गानों के interlude और prelude उनकी पहचान बन जाते हैं।
इसके अलावा किसी किसी गानों में Ad-lib भी होता है। Ad-lib गाने का वो हिस्सा होता है जो ताल में बंधा नहीं होता जैसे "शोर नहीं बाबा सोर" ।
चलिए अब ताल के बारे में बात करते हैं।
कोई भी गाना किसी न किसी ताल में लयबद्ध किया जाता है। शास्त्रीय संगीत में वैसे कईं ताल हैं लेकिन अगर हम फ़िल्मी गानों, भजन या ग़ज़ल की बात करें तो इसमें मुख्यतः ३ या ४ ताल उपयोग में लाए गए हैं। पर इससे भी पहले का सवाल, ताल क्या है?
ताल गीत को लयबद्ध करने का एक माध्यम होता है। ताल में मात्रायें होती हैं। हम अलग अलग ताल और ठेके आगे देखेंगे लेकिन सरल शब्दों में कहा जाए तो कोई भी गाना निश्चित मात्राओं में लयबद्ध किया जाता है। उदाहरण "जब प्यार किया तो डरना क्या " 6 मात्राओं में लयबद्ध किया गया है और इन ६ मात्राओं के ताल को दादरा कहा जाता है और हम यह कह सकते हैं की ये गीत ताल दादरा में है। आम तौर पर एक गाने में मात्राओं की संख्या निश्चित रहती है बदलती नहीं।
95% हिंदी फ़िल्मी गाने या तो 8 मात्राओं में लयबद्ध होते हैं, या फिर ६ मात्राओं में। 8 मात्रा के ताल को कहरवा कहते हैं।
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